काल-प्रवाह और सनातन की छाँव
समय के दरिया में कितने ही कारवाँ आए और बिखर गए, पर भारत की आत्मा हर आँधी को चीरकर अमर रही।
समय के सिंधु तट पर कितने ही पाँव पड़े,
कोई आया लूटने, कोई यहीं छाँव में जड़े।
स्टेपी की ठंडी हवा से, ईरान के दारा तक,
सिकंदर के अरमान मिटे, पर धारा न रुकी एक पल तक।
कोई यूनानी बना वासुदेव का अनन्य पुजारी,
तो कोई शक-कुषाण हुआ इस माटी पर बलिहारी।
पर कुछ आंधियाँ ऐसी आईं जो ज़ख्म गहरे दे गईं,
सोमनाथ और काशी की टूटी ईंटें सिसकियाँ कह गईं।
मस्जिदों के पत्थरों में मंदिरों के अक्स बोले,
इतिहास के पन्नों में सच और भ्रम दोनों हैं डोले।
पुर्तगाल की ज़िद ने सताया, गोवा की पीड़ा जानी,
मैकॉले की कलम ने बदली मानस की रवानी।
फिर भी हे भारत भूमि तेरी यह कैसी है माया?
कबीर की साखी ने घर-घर अलख जगाया।
मीरा के घुंघरू गूँजे, तुलसी का राम-चरित छाया,
विजयनगर और सिखों ने तलवार से धर्म बचाया।
यह देश किसी एक का मोहताज नहीं, एक धारा नहीं,
यह बहता हुआ अमृत है, जिसका कोई किनारा नहीं।
हर आंधी को सहकर जो दिए की लौ जलाए,
वही सनातन प्राण है, जो हर युग में मुस्कुराए।
परतें