चेतना के लोक और अंतरिक्ष
वैदिक ऋचाओं से उपनिषदों तक, चेतना के अनन्त विस्तार की गाथा है यह...
परत दर परत खुलते हैं ब्रह्मांड के ये द्वार,
वेदों की ऋचाओं में बसा दिव्यता का सार।
लोकों की संरचना कोई भूगोल नहीं मात्र,
चेतना के स्तरों से जुड़े हैं इसके गात।
बृहदारण्यक और छांदोग्य का पावन गान,
तैत्तिरीय उपनिषद दे रहा चेतना का ज्ञान।
पुराणों के पन्नों पर द्वीप और सागर अपार,
मेरु के नक्शे में छिपा है सृष्टिकर्ता का प्यार।
आर्यभटीय और सूर्य सिद्धांत की गणितीय डोरी,
गोल पृथ्वी की गाथा गाए नभ की छोरी।
शांत मन से जो झांके इन ग्रंथों के भीतर,
पाए अपनी ही आत्मा में अंतरिक्ष का सुंदर बिस्तर।
परतें