ग्यारह दूर्वा का अर्पण

ग्यारह दूर्वा की कोमल गाँठें और भक्ति का सरल भाव, विघ्नहर्ता के चरणों में समर्पित एक शांत प्रार्थना।

ग्यारह दूर्वा चुनीं मैंने, डंठल सब हटाए हैं। तीन पत्र की गाँठ बाँधकर, चरण तुम्हारे लाए हैं॥ गुड़-घृत की कुछ बूँदें अर्पित, भेंट यही बस सारी है। जो कुछ भी है पास मेरे, सब तुम पर बलिहारी है॥ नाम तुम्हारा मन में धरकर, पथ के काँटे मिट जाते हैं। तुम पर ही विश्वास टिकाकर, पग आगे बढ़ पाते हैं॥ जल में मूर्ति विसर्जित होगी, मिट्टी में मिट्टी मिल जाएगी। छवि तुम्हारी हृदय बसेगी, धारा में न बह पाएगी॥ घर लौटूँगा, दीप जलाऊँगा, सुबह तुम्हें ही ध्याऊँगा। विघ्नहर्ता हे एकदंत, मैं तुमको ही पाऊँगा॥ बल-बुद्धि का वर दो स्वामी, विनय भाव मन में भर दो। ग्यारह दूर्वा की इस निष्ठा से, जीवन सफल मेरा कर दो॥

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